घर भरा हुआ था।
आँगन में रिश्तेदारों की आवाज़ें थीं—हँसी, गाने, बर्तनों की खनक।
शादी की तारीख़ पास थी, और हर कोना तैयारियों से भरा हुआ।
सौम्या गुनगुनाती हुई कमरे में आई।
अलमारी से सलवार-कमीज़ निकाली और बेड पर रख दी।
फिर बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और नल खोल दिया।
एक-एक कर उसने कपड़े उतारकर गंदे कपड़ों के बैग में रख दिए।
पानी गिरता रहा।
गरम भाप उठती रही।
एक हफ्ते में शादी थी।
उसकी आँखों के सामने करण का चेहरा तैर गया—
करण, उसका मंगेतर, होने वाला पति।
अमेरिका रिटर्न।
स्मार्ट और शार्प।
स्विट्ज़रलैंड के हनीमून के टिकट बुक हो चुके थे।
वीज़ा प्रोसेस हो चुका था।
करण के पापा फॉरेन सर्विस से रिटायर्ड थे और ताऊजी—पशुपति साहब—इलाके के बड़े ज़मींदार।
तो काग़ज़ी कार्रवाई में देर होनी ही नहीं थी।
एक सुखद भविष्य सौम्या की राह देख रहा था।
होंठ दबाकर वह मन ही मन हल्का-सा मुस्कुरा दी।
तभी दरवाज़े का हैंडल हिला।
सौम्या ठिठकी।
पहले लगा, शायद किसी ने गलती से पकड़ लिया होगा।
फिर हैंडल दोबारा घूमा।
और दरवाज़ा खुल गया।
उसकी चीख गले में अटक गई।
सामने करण खड़ा था।
चेहरे पर न कोई झिझक।
न कोई हैरानी।
जीन्स और जैकेट पहने।
एक पल के लिए सौम्या को यह भी याद नहीं रहा
कि उसने कुछ पहना है या नहीं।
उसके और दुनिया के बीच कुछ भी नहीं बचा था।
वह सिमट गई और अपने हाथों से खुद को ढक लिया।
दीवार से चिपक गई।
“करण, तुम यहाँ? बाहर जाओ!”
उसकी आवाज़ काँप गई।
तौलिया दूर, ठीक करण के पीछे टंगा था।
करण मुस्कराया।
उसकी नज़रें—बिलकुल बेधड़क।
“इतना क्यों घबरा रही हो?” उसका लहजा हल्का था, मज़ाक़ जैसा। “अब तो सब अपना है।”
सौम्या ने एक बाँह सीने पर कस ली।
दूसरी नीचे।
उसकी पीठ दीवार से लगी थी—पीछे हटने की कोई जगह नहीं।
“करण, बाहर निकलो। अभी के अभी।”
अब यह विनती नहीं थी।
“अरे यार,” करण हँसा। “तुम लड़कियाँ भी बहुत सेंसिटिव हो जाती हो। शादी के बाद सुहागरात है। उस रात तो सारे परदे वैसे ही हट जाते हैं।”
करण एक क़दम आगे बढ़ा।
“पापा! राजीव भैया!” सौम्या तेज़ स्वर में चीखी।
“रिलैक्स, रिलैक्स,” करण पीछे हटा— फिर नज़रें पैनी करके बोला, “बस एक बार देख लूँ। फिर चला जाऊँगा।”
सौम्या की आँखें भर आईं।
जिस आदमी को वह अपना प्रिंस चार्मिंग समझ रही थी, वही अब उसे ख़तरा लग रहा था।
उसने आँखें बंद कीं।
शरीर जैसे सुन्न पड़ गया।
करण ने फोन निकाला।
स्क्रीन जल उठी।
“बस एक याद,” उसने कहा। “शादी तक इंतज़ार मुश्किल है।”
“फोन बंद करो!” सौम्या चीखी।
उस पल उसने करण की आँखों में कुछ ऐसा देखा
जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वह काँपने लगी।
“बाहर निकलो,” उसने फिर कहा। “अभी के अभी।”
करण एक पल रुका।
अब चेहरे पर हँसी नहीं थी।
“सुहागरात को कुछ नहीं सुनूँगा,” उसने ठंडे स्वर में कहा।
फोन नीचे किया— मानो एहसान कर रहा हो।
दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए
उसने पीछे मुड़कर आख़िरी बात कही—
“हर रात, डार्लिंग। हर रात।”
हाथों से अश्लील इशारा किया, और धीरे-धीरे दरवाज़े से बाहर हो गया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
सौम्या ने भागकर चिटखनी लगाई।
पानी अब भी बह रहा था।
वह फर्श पर बैठ गई।
आँखों में आँसू थे।
शरीर काँप रहा था।
एक ठंडी-सी सिहरन रीढ़ से नीचे उतरती चली गई।
उसके होंठ हिले—“क्या मैं किसी इंसान से शादी करने जा रही हूँ… या एक हैवान से?”